How the Earth Was Born in Hindi -पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति कैसे हुई ?

How the Earth Was Born in Hindi ! पहले मिट्टी से बनी हुई धरती नहीं थी और चारों तरफ जल ही जल था।  सबसे पहले बड़े मालिक ठाकुर ने चांद और सूरज को बनाया।  उसके बाद देव – देवताओं को बनाया।  लेकिन देवताओं को बनाने से भी ठाकुर जी को संतोष नहीं हुआ।  तब उन्होंने विचार-विमर्श के लिए पंचदेव ,षष्ठ   देव, देवस्थान की देवी तथा अन्य देवताओं को बुलाकर उनसे कहा, जिस प्रकार तुम लोग मेरे अनुगामी हो, जिस प्रकार तुम लोग मेरा आदर सम्मान करते हो, उसी प्रकार तुम्हारे सम्मान के लिए मैं जीव आत्मा वाले मानव की  संसार बनाना चाहता हूं।

How the Earth Was Born in Hindi

 

तुम लोग स्वर्ग की शोभा हो और वह पृथ्वी की शोभा बढ़ाएंगे।  परमपिता ठाकुर जी की बात सुनकर सारे देवता प्रसन्न हुए।  तब ठाकुर जी ने स्वर्ग से एक कपिल गाय को रेशम की डोरी से खींचकर समुंदर में उतारा।  पानी पीने से पहले गाय के मुख में खाने के लिए धान तथा कमल आदि  के दाने  दिए गए थे।  उसमें से कुछ दाने  गाय के मुंह में  लगे रह गए।  पानी पीते  समय वह  वह दाने समुंद्र में तैरने  लगे।

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How the Earth Was Born in Hindi !

गाय के मुंह से झाग भी निकला।  ठाकुर जी ने उसी झांग  में आत्मा को डाल दिया।   जैसे ही  झाग में आत्मा पड़ी , वैसे ही वह दो जीवित  हंसों के रूप में परिवर्तित हो गया।  उन  हंस  में एक मादा थी और दूसरा नर था।   यही दो पक्षी  हंस और हासन के नाम से विख्यात हुए।  ठाकुर के  आशीर्वाद से दोनों पक्षी बड़े होते गए।  किंतु चारों ओर जल ही जल होने के कारण वह निरंतर उड़ते और  पीड़ा भरी आवाज में रोते रहते।

ठाकुर जी का हृदय पसीज गया।  उन्होंने सबसे बड़े देवता को बुलाकर कहा।  इतने बड़े समुंद्र में दो चिड़ियों ने जन्म लिया है।  देखने में वह बहुत ही सुंदर हैं लेकिन उनके रुकने के लिए कोई स्थान नहीं है।  उनका रोना सुनकर बड़ी दया आती है।  इसलिए सभी देवताओं को लेकर समुंद्र के पास जाओ।  इसके लिए कुछ उपाय सोचो।  ठाकुर जी का आदेश पाकर बड़े देवता ने सभी देवता को बुलाया और उन्हें साथ लेकर समुद्र के पास गए। How the Earth Was Born in Hindi !

पक्षियों का रोना सुनकर उनको भी बहुत दया आई।  तब बड़े देवता ने अपने माथे का पसीना पौछकर समुद्र में छिड़क दिया।  उस पसीने और संबंधों के सहयोग से कर्म का वृक्ष उगाया।  फिर उन्होंने अपनी दाढ़ी के पसीने को समुद्र में छिड़काव करके श्रम का पौधा उगाया।  यह पौधे अथाह जल राशि पर  तैरने लगे।

Prithvi par jeevan ki utpatti kaise hui  |  पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति कैसे हुई ?

अब दोनों पक्षी इन बृक्षों  पर विश्राम करने लगे।  कुछ समय के पश्चात उन्होंने उन्हीं पेड़ों पर घोसले बनाएं और दो अंडे भी दिए।  ठाकुर जी की विचित्र लीला थी। कि समय आने पर उन अंडों में से दो मानव संतानों ने जन्म लिया।

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हांस और हासिल चिंता में पड़े कि इन  मानव को कहां रखा जाए।  किस प्रकार उनका लालन-पालन किया जाएगा।  ईश्वर ने वैसे ही उनकी पुकार सुन ली।  हांस  और  हासिल  की उन दोनों संतानों  पिलचु  हाड़ाम और पिलचु  बुढ़ी  तथा उनकी आने वाली संतानों को सुरक्षित रखने के लिए पृथ्वी का निर्माण आरंभ हुआ।  घोषणा की गई के सातों समुद्र के राजाओं में से जो कोई समुद्र के पानी के ऊपर मिट्टी चढ़ा देगा उसके लिए ठाकुर जी की ओर से दोनों लोकों में खाने-पीने की उचित व्यवस्था की जाएगी।  तथा हर तरह की सुविधा दी जाएगी।  घोसणा  सुनकर सभी राजाओं ने समुद्र  पर मिट्टी चढ़ाने के अनेकों  प्रयत्न किए।  परंतु सफल नहीं हुए।  तब कछुए के  चार पैरों के साथ नागनाथ को भी बांधा गया। How the Earth Was Born in Hindi !

Prithvi par jeevan ki shuruat kaise hui ?

और केचुए  ने उन पर मिट्टी चढ़ा दी।  इस तरह धरती का निर्माण संभव हो सका।  धरती तो बन गई किंतु दो स्थानों पर मिट्टी कुछ उभरी  रह गई थी।   इन स्थानों को हिहिदी  और पिपड़ी कहा गया।  और यही संथालो  के प्रथम पूर्वज  पिलचु  हाड़ाम और पिलचु  बुढ़ी का निवास स्थान बने।  पिलचु  दंपति के सात  पुत्र तथा 7 पुत्रियां हुई। पिलचु  हाड़ाम  बच्चों को लेकर खंडेरा जंगल में तथा पिलचु  बुढ़ी  बच्चियों के साथ शुडकुच   जंगल में रहने लगी।  जब बच्चे जवान हुए तो उन्होंने अनजाने ही विवाह संबंध स्थापित कर लिए।

prithvi par jeevan ki utpatti kaise hui

 

इस प्रकार संथाल   लोग अपने को  होड़   भी कहते हैं।  उनकी सृस्टि – कथा के अनुसार कछुए के ऊपर धरती का निर्माण हुआ है।  कछुए को संथाली भाषा में होरों कहते हैं।   संथाल नाम उस समय पड़ा होगा जबकि यह  7 भूम  में रहा करते थे।  वहां वे अपने को शांत होड  कहा करते थे।

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