Chandravali ki kahani- चन्द्रावली ने दोनों कुल की लाज  कैसे बचाई !

Chandravali ki kahani ! सात सहेलियों के संग पानी भरने के लिए राजकुमारी चंद्रावली गई हुई थी ।  रास्ते में पठानों के डेरे पढ़ते थे। चंद किरण सी उजली चन्द्रावली ,जिसके  लंबे – लंबे केश थे । जैसे ही चंद्रावली को युवा पठान सैनिक ने उन्हें देखा।  तो मोहित हो गया।  और तलवार दिखाकर उसे उसकी  सहेलियों से छुड़ा लिया।  सखियां अपने पति और भाइयों के प्राणों की रक्षा के लिए इतनी  डर  गई कि घरों में  लौटकर वह किसी से भी यह बात ना  बता सकी।

Chandravali ki kahani

चंद्रावली बेचारी के पास अपना कौन था।  उसने आसमान में देखा तो चील उड़ रही थी।  अरी ! चील  तुम मेरे पीहर  जाओ और मेरे बाबुल से कहो कि तुम्हारी बेटी  जालिम लाल सिपाही ने छुड़ा ली है।  अरी ओ चील  ! तुम मेरे ससुर के दरबार जाओ। जेठ और  ससुर से कहो तुम्हारी बहु पठान ने घेर ली है।  अरि चील  ! जैसे ही बाबुल और वीरन  ने चील  के द्वारा प्राप्त संदेश सुना तो, रो दिए।  और मैया और भावज ने सुना तो  पछाड़ खाकर गिर पड़ी।

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Chandravali ki kahani | chandrawal rani ki kahani !

ससुर और जेठ ने सुना तो, रो दिए।  सास और  जिठानी  ने सुना तो  पछाड़ खाकर गिर पड़ी।  परंतु बाबुल ने गिन्नी की थैली  अपनी कमर में बाधीं ।  और भाई ने सोने की  मोहर  ली ।  जेठ और  ससुर ने हाथी और घोड़े  साथ लिए। और  चंद्रावली को छुड़ाने पहुंच गए।  छोटे से देवर के पास एक गेंद थी।  वह गेंद के बदले ही चंद्रावली को छुड़ाने जा पहुंचा।  और पीछे-पीछे नागर  पान चबाते हुए पालकी पर बालम  (पति ) पहुंचे।  पठान सैनिक ने  बाबुल,  बीरन, और ससुर और  जेठ  सब  से कह दिया कि, मेरे  पास हाथी – घोड़े गिन्नी  और  मोहर इतनी है जिसका  कोई  ओर – छोर  नहीं है। Chandravali ki kahani

किंतु ऐसी चंद्रावली ना मिले ! जैसी राजकुमारी।  अब  पति  ने विनय की तो वह बोला ! चंद्रावली  के बाबुल, बालम, भाई  और ससुर और जेठ  मिलकर अपनी और पठान की ताकत का अनुमान करते , पर कुछ  निश्चय नहीं कर पाते। परन्तु उनकी आंखों में आंसू देखे तो चंद्रावली ने कहा।

Chandrawal gujari ki katha | चन्द्रावली ने दोनों कुल की लाज  कैसे बचाई ?

जब सब लौट गए, तब चंद्रावली ने पठान  युवक से कहा कि  सुन रे  पठान के छोरा।  मुझे प्यास लग रही है।  जाओ  लोटा को  माजकर पानी भर लाओ।  इधर पठान ने पीठ मोडी,  उधर चंद्रावली ने तंबू में आग लगा ली।  और काजी से कहा ! अरे काजी, इतनी जोर से ढोल बजा के  पीहर और  ससुराल तक सुनाई  दे।

चंद्रावली मर गई, पर उसकी कहानी ब्रज के लोक गीतों में अमर है।  11 महीने के बाद हर बार सावन आता है।  गांव गांव में आम और नीम की डाली पर झूले पड़ते हैं।  बृज की बेटियों की आंखों में चंद्रावली का सौंदर्य हर बार साकार हो जाता है।  मोर, तोता, पपईया और कोयल के कलरव के बीच किसानों की बेटियों के कंठ में वीर – सुंदरी चंद्रावली के बोल हर बार गूंजते  रहते हैं। Chandravali ki kahani

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